हम अपनी नदियों के ऋणी हैं
नदी को साफ़ करना अभियांत्रिकी की नहीं, नैतिकता की समस्या है।
कुछ घटनाएँ ख़ुद को ज़ोर से घोषित करती हैं। यह चुपचाप जमती रही, जब तक इतनी बड़ी न हो गई कि नज़रअंदाज़ न की जा सके और इतनी परिणामकारी कि ग़लत न पढ़ी जा सके।
नदी को साफ़ करना अभियांत्रिकी की नहीं, नैतिकता की समस्या है।
पृष्ठभूमि
आँकड़े एक कहानी कहते हैं; उनके भीतर के लोग दूसरी। दोनों सच हैं, और एक-दूसरे के बिना कोई भी पूरी नहीं।
ब्योरे कहानी से ध्यान भटकाते नहीं। ब्योरे ही कहानी हैं।
यहाँ संदर्भ मायने रखता है, क्योंकि अभी लिए जा रहे फ़ैसले बाद में पलटना कठिन और महँगा होगा।
आगे क्या
आगे क्या होगा, यह किसी एक घोषणा से कम और उस ख़ामोश, बेरौनक अनुवर्तन से अधिक तय होगा जो शायद ही कभी पहले पन्ने पर आता है।
लेखक


टिप्पणियाँ
0