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टैगोर गार्डन का ढहता ऐतिहासिक ताना-बाना: आधुनिक बदलावों से मिट रही बंटवारे के दौर की वास्तुकला

पश्चिमी दिल्ली के टैगोर गार्डन और आसपास की कॉलोनियों में आधुनिक सौंदर्यकरण के चलते वर्ष 1947 के शरणार्थी पुनर्वास की ऐतिहासिक वास्तुकला के साक्ष्य तेजी से गायब हो रहे हैं।

Delhi Darpan Desk
Delhi Darpan Deskसमाचार डेस्क
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2 अगस्त 2026 · 11:59 pm3 हज़ार व्यूज़अपडेटेड 11:59 pmनई दिल्ली
टैगोर गार्डन का ढहता ऐतिहासिक ताना-बाना: आधुनिक बदलावों से मिट रही बंटवारे के दौर की वास्तुकला
टैगोर गार्डन का ढहता ऐतिहासिक ताना-बाना: आधुनिक बदलावों से मिट रही बंटवारे के दौर की वास्तुकला — Hindustan Times

दिल्ली दर्पण ब्यूरो रिपोर्ट :-

पश्चिमी दिल्ली का टैगोर गार्डन इलाका और इसका स्थापत्य देश के विभाजन के बाद दिल्ली में शरणार्थियों के पुनर्वास के इतिहास की एक अनूठी पहचान समेटे हुए है। हालांकि, हाल के वर्षों में मकानों में हो रहे आधुनिक पुनर्निर्माण और बदलावों के कारण इस ऐतिहासिक ताने-बाने के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है। विशेषज्ञों के अनुसार, सिरेमिक क्लैडिंग और एल्यूमीनियम फ्रेम जैसे नए बदलाव उस दौर की वास्तुकला से जुड़े भौतिक साक्ष्यों को मिटा रहे हैं।

वर्ष 1947 के विभाजन के बाद पंजाब से आए विस्थापितों को बसाने के लिए पश्चिमी दिल्ली में टैगोर गार्डन, राजौरी गार्डन और पटेल नगर जैसी कॉलोनियों का निर्माण किया गया था। जनगणना 1951 के आंकड़ों के मुताबिक, उस दौरान दिल्ली की कुल आबादी में लगभग 28 प्रतिशत हिस्सा विस्थापित लोगों का था। इस आबादी का एक बड़ा हिस्सा पश्चिमी दिल्ली के पुनर्वास क्षेत्रों में बसाया गया था।

दिसंबर 2005 में ब्लू लाइन पर शुरू हुए टैगोर गार्डन मेट्रो स्टेशन के पास स्थित यह कॉलोनी तातारपुर गांव से सटी है। शुरुआती दौर में संसाधनों की कमी और तात्कालिक जरूरत को देखते हुए यहां की इमारतों को बिना किसी अतिरिक्त सजावट के केवल बुनियादी आश्रय के रूप में तैयार किया गया था। साठ के दशक में बने इन मकानों में सीधी सीढ़ियां, सपाट छतें और एक ही मानक पैटर्न की जालियों का उपयोग किया गया था।

सत्तर के दशक में इन मकानों में निवासियों ने अपनी जरूरतों के हिसाब से बिना आधिकारिक मंजूरी के कमरे जोड़े और अतिरिक्त निर्माण किए। छतों को बेडरूम का रूप दिया गया, बालकनियों का विस्तार हुआ और अग्रभाग पर टाइलें लगाई गईं। बिना किसी पूर्वनियोजित योजना के हुए ये निर्माण दिल्ली विकास प्राधिकरण के रिकॉर्ड से इतर यहां की कॉलोनियों के विकास का माध्यम बने।

अस्सी के दशक में पश्चिमी दिल्ली की इन कॉलोनियों को हिंदी फिल्मों में मध्यमवर्गीय दिल्ली के वास्तविक परिवेश को दर्शाने के लिए पृष्ठभूमि के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। तंग सीढ़ियां, छज्जों पर सूखते कपड़े और संकरे रास्तों में खड़ी गाड़ियां पर्दे पर दिल्ली के साधारण परिवारों के दैनिक जीवन की पहचान बन गईं।

पुरातत्व और समकालीन कला क्षेत्र से जुड़ीं अनिका मान के अनुसार, वर्तमान में हो रहे री-क्लैडिंग और जीर्णोद्धार के कारण मकानों का ऐतिहासिक मूल रिकॉर्ड खत्म हो रहा है। ठेकेदारों द्वारा किए जा रहे ये बदलाव उस दौर की बनावट को मिटा रहे हैं जो यह दर्शाती थी कि दिल्ली ने किस तरह आपात स्थिति में आए लाखों लोगों को शरण देकर एक सामान्य जीवन की नींव रखी थी।

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