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मैराथन बहस के बाद संसद ने ऐतिहासिक डेटा-संरक्षण विधेयक पारित किया

यह विधेयक बदल देगा कि कंपनियाँ 90 करोड़ भारतीयों का निजी डेटा कैसे इकट्ठा, संग्रहित और साझा करती हैं — और नए नियामक को व्यापक अधिकार देता है।

Delhi Darpan Desk
Delhi Darpan Deskसमाचार डेस्क
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12 जुलाई 2026 · 10:12 pm48.2 हज़ार व्यूज़अपडेटेड 12:40 amनई दिल्ली
थाने में पुलिसकर्मी हिरासत में लिए गए संदिग्धों को प्रस्तुत करते हुए
थाने में पुलिसकर्मी हिरासत में लिए गए संदिग्धों को प्रस्तुत करते हुए — Delhi Darpan

ग्यारह घंटे तक संसद की बत्तियाँ जलती रहीं। जब आख़िरकार रात दो बजे के कुछ बाद मतदान हुआ, तो एक दशक में सरकार का सबसे परिणामकारी डिजिटल-अधिकार कानून पारित हो चुका था — जिसने एक झटके में क़रीब 90 करोड़ भारतीयों के ऑनलाइन निजी डेटा को नियंत्रित करने वाले नियम फिर से लिख दिए।1

यह विधेयक एक नवगठित डेटा संरक्षण बोर्ड को उल्लंघनों की जाँच करने, हज़ारों करोड़ तक के जुर्माने लगाने और — पहली बार — किसी कंपनी को वह डेटा मिटाने का आदेश देने का व्यापक अधिकार देता है जिसे इकट्ठा करने का उसे कभी हक़ ही नहीं था। समर्थक इसे डिजिटल नागरिक के लिए देर से आया अधिकार-पत्र कहते हैं। आलोचक इसमें एक ऐसा नियामक देखते हैं जिसकी स्वतंत्रता पेंसिल से लिखी गई है।

असल में क्या बदलता है

व्यवहार में तीन बदलाव सबसे अहम हैं। सहमति अब विशिष्ट और वापस लेने योग्य होनी चाहिए — कहीं दबा हुआ चेकबॉक्स अब मान्य नहीं। कंपनियों को एक शिकायत अधिकारी नियुक्त करना होगा जो उपयोगकर्ता की अपनी भाषा में उपलब्ध हो। और देश के बाहर किसी भी डेटा हस्तांतरण के लिए अब बोर्ड की मंज़ूरी ज़रूरी है — एक ऐसा प्रावधान जिसने बड़े प्लेटफ़ॉर्म के वकीलों का पूरा सप्ताहांत फिर से मसौदा लिखने में बिता दिया।

  • विशिष्ट सहमति — एक उद्देश्य, एक अनुमति; पहले से टिक किए गए बॉक्स रद्द।
  • मिटाने का अधिकार — उपयोगकर्ता विलोपन की माँग कर सकते हैं, और बोर्ड उसे बाध्य कर सकता है।
  • सीमा-पार सीमाएँ — विदेश हस्तांतरण के लिए पूर्व मंज़ूरी आवश्यक।

जो अधिकार लागू न हो सके वह शिष्टाचार है, कानून नहीं। सवाल कभी सिद्धांत का नहीं था — दाँतों का था।

मीरा कृष्णन, सदन से रिपोर्ट
देर रात मतदान के दौरान सदन
रात 2:11 बजे सत्तापक्ष की बेंचें, विभाजन-घंटी से कुछ मिनट पहले।— Delhi Darpan / Rohan Desai

आगे की लड़ाई

कानून की असली परीक्षा अब शुरू होती है — इसके बाद बनने वाले नियमों में। बोर्ड में नियुक्तियाँ कैसे होती हैं, वह कितनी तेज़ी से काम कर सकता है, और राज्य के लिए ही रखी गई छूटें न्यायिक जाँच में टिकती हैं या नहीं — यही तय करेगा कि यह मील का पत्थर है या बस एक लेटरहेड।2 याचिकाएँ अभी से तैयार हो रही हैं।

पाद-टिप्पणियाँ

  1. 1.आँकड़ा मंत्रालय के अपने 2025 डिजिटल-समावेशन अनुमान से। ↩
  2. 2.राज्य-छूटों को चुनौती देने वाली दो याचिकाएँ अवकाश-पीठ के समक्ष अपेक्षित हैं। ↩
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