जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के आरोप में बंद कॉकरोच जनता पार्टी के दो नेता तिहाड़ से रिहा
मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन करने वाले सीजेपी नेताओं को अदालत के आदेश के बाद रिहा किया गया।

राजधानी के जंतर-मंतर पर अनाधिकृत प्रवेश के आरोप में गिरफ्तार किए गए कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के दो प्रमुख नेताओं को करीब एक हफ्ते बाद तिहाड़ जेल से रिहा कर दिया गया है। मजिस्ट्रेट द्वारा रिहाई का आदेश दिए जाने के कुछ घंटों बाद सौरव दास और आशुतोष रांका जेल से बाहर आ गए।
लीगल न्यूज वेबसाइट 'बार एंड बेंच' के मुताबिक, दिल्ली की एक विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट अदालत ने दोनों की रिहाई का आदेश जारी किया। पुलिस ने दोनों को उस समय हिरासत में लेकर जेल भेजा था, जब उन्होंने बैरिकेड लांघकर जंतर-मंतर के बंद गेट पर चढ़ने की कोशिश की थी। इस ऐतिहासिक स्थल को हाल ही में आधिकारिक प्रदर्शन स्थलों की सूची से बाहर कर दिया गया था।
जमानत मिलने के बाद सौरव दास ने पुलिस वैन से संवाददाताओं से कहा, "सत्यमेव जयते। क्रांति अमर रहे।" दोनों नेताओं ने किसी भी तरह के गलत आचरण से इनकार किया है। वे भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे थे।
सीजेपी कोई पंजीकृत राजनीतिक दल नहीं है, बल्कि जेन-जी और युवाओं का एक समूह है। इसकी शुरुआत मई में एक इंटरनेट मजाक के तौर पर तब हुई थी, जब देश के शीर्ष न्यायाधीश ने बेरोजगार युवाओं की तुलना 'कॉकरोच' से की थी। इसके बाद समूह ने परीक्षा के पेपर लीक होने के मुद्दे पर हजारों युवाओं को लामबंद करना शुरू किया था।
उस दौरान संसद की ओर निकाले गए एक मार्च के दौरान पुलिस के साथ प्रदर्शनकारियों की झड़प हुई थी, जिससे यह आंदोलन चर्चा में आया और सरकार पर दबाव बढ़ा। इस विरोध-प्रदर्शन के चलते अंततः देश के शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा था। इसके बाद से सीजेपी ने अपना ध्यान चुनावी प्रणाली की ओर केंद्रित किया है।
सीजेपी और विपक्षी दलों का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के जरिए केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को लाभ पहुंचा रहे हैं। हालांकि, चुनाव आयोग और भाजपा दोनों ने ही इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है।
एसआईआर प्रक्रिया के तहत पिछले साल से अब तक मतदाता सूची से करीब 13 करोड़ नाम हटाए गए हैं। आलोचकों का कहना है कि इस कवायद से पात्र मतदाताओं के नाम कटने और उनके मताधिकार छिनने का खतरा है, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया अपात्र, मृत और दोहरे नामों को हटाने के लिए चलाई जा रही है।
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