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Ashok Vihar | सोसाइटी की सियासत का रामलीला पर कितना असर ? पहली बैठक में ही मिल गया जवाब !

- चुनावी हार के बाद भी रामलीला कमेटी की बैठक में अनिल गुप्ता दिखे पूरी तरह सहज - ललित गर्ग और अनिल गुप्ता के बीच हंसी-मजाक, मतभेदों से ऊपर दिखी रामलीला

Delhi Darpan Desk
Delhi Darpan Deskसमाचार डेस्क
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17 अगस्त 2026 · 6:35 am1 हज़ार व्यूज़अपडेटेड 6:37 amNorth west Delhi
Ashok Vihar | सोसाइटी की सियासत का रामलीला पर कितना असर ? पहली बैठक में ही मिल गया जवाब !
Ashok Vihar | सोसाइटी की सियासत का रामलीला पर कितना असर ? पहली बैठक में ही मिल गया जवाब ! — Delhi darpan

- दिल्ली दर्पण ब्यूरो | दिल्ली नॉर्थ दिल्ली के अशोक विहार में सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं की अपनी एक मजबूत पहचान है। इन संस्थाओं के प्रमुख किसी न किसी रूप में अशोक विहार रामलीला कमेटी, फेज-1 से जुड़े रहे हैं। यही वजह है कि रामलीला कमेटी को अशोक विहार की सामाजिक गतिविधियों का ऐसा केंद्र माना जाता है, जहां अलग-अलग संस्थाओं की गतिविधियां आकर मिलती हैं। इसी बीच, अशोक विहार की प्रतिष्ठित अग्रवाल वेलफेयर सोसाइटी के हालिया चुनाव ने सामाजिक हलकों में नई राजनीतिक चर्चा छेड़ दी। 2 अगस्त को हुए चुनाव में चेयरमैन पद से जुड़े अनिल गुप्ता ‘घी वाले’ अपने पूरे पैनल के साथ चुनाव हार गए। इसके बाद सवाल उठने लगा था कि क्या सोसाइटी की इस हार का असर रामलीला कमेटी पर भी पड़ेगा? क्या अनिल गुप्ता को रामलीला कमेटी से भी किनारे किया जाएगा?

लेकिन रविवार को हुई रामलीला कमेटी की बैठक ने फिलहाल इन तमाम अटकलों पर विराम लगा दिया।

बैठक में अनिल गुप्ता न केवल सहज नजर आए, बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ रामलीला की तैयारियों पर चर्चा करते दिखाई दिए। खास बात यह रही कि रामलीला कमेटी के प्रधान ललित गर्ग और अनिल गुप्ता के बीच बैठक का माहौल भी सामान्य रहा। दोनों के बीच बातचीत, हंसी-मजाक और रामलीला की तैयारियों को लेकर चर्चा ने साफ संकेत दिया कि सोसाइटी के चुनावी मतभेदों को रामलीला से अलग रखने की कोशिश की जा रही है।

दरअसल, सोसाइटी चुनाव में अनिल गुप्ता की हार को लेकर अशोक विहार में काफी चर्चा रही। उनके खिलाफ समाज के कई प्रमुख चेहरे खुलकर सामने आए थे। नंद किशोर अग्रवाल, बृजमोहन गर्ग, सुरेंद्र पाल गुप्ता, अरुण बंसल और अर्जुन दास सिंघल समेत कई प्रमुख लोगों ने अनिल गुप्ता और उनके सहयोगी दीपक जिंदल पर तानाशाही और मनमानी के आरोप लगाए थे। इन प्रमुख लोगों ने दिल्ली दर्पण टीवी के माध्यम से समाज से पवन गुप्ता के सद्भावना पैनल को समर्थन देने की अपील भी की थी।

चुनाव परिणाम आया तो अनिल गुप्ता का पूरा पैनल हार गया। ऐसे में इसे सिर्फ पवन गुप्ता की जीत नहीं, बल्कि अनिल गुप्ता के खिलाफ समाज के असंतोष के रूप में भी देखा गया। हालांकि, अब रामलीला कमेटी की पहली बैठक में जो तस्वीर सामने आई है, उसने कहानी का दूसरा पहलू भी दिखा दिया है। चुनावी हार के बावजूद अनिल गुप्ता और उनसे जुड़े लोग रामलीला की बैठक में सहज दिखाई दिए। इससे संकेत मिला कि सोसाइटी के फैसले को स्वीकार करते हुए व्यक्तिगत राजनीतिक मतभेदों को रामलीला से दूर रखने की कोशिश की जा रही है। बैठक में अनिल गुप्ता ने साफ कहा कि जब तक वे जीवित हैं, रामलीला कमेटी और रामलीला मंचन की भव्यता को बरकरार रखने के साथ उसे और आगे बढ़ाने का प्रयास करते रहेंगे। उन्होंने रामलीला कमेटी के प्रधान ललित गर्ग की भी जमकर तारीफ की। उनका कहना था कि जब से ललित गर्ग प्रधान बने हैं, रामलीला कभी घाटे में नहीं गई और आगे भी नहीं जाएगी। बैठक के दौरान कमेटी के कुछ प्रमुख लोगों ने ललित गर्ग और अनिल गुप्ता की जोड़ी को ‘राम-लक्ष्मण की जोड़ी’ तक की संज्ञा दे दी। यह टिप्पणी अपने आप में इस बात का संकेत थी कि सोसाइटी की चुनावी राजनीति को रामलीला की व्यवस्था से अलग रखने की कोशिश हो रही है। रामलीला के आयोजन में अनिल गुप्ता की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। रामलीला मंचन के लिए होने वाले धन संग्रह का एक बड़ा हिस्सा उनकी ओर से जुटाया जाता है। हालांकि, रामलीला कमेटी को आर्थिक सहयोग केवल उनके समर्थकों से ही नहीं मिलता। सोसाइटी चुनाव में उनके विरोध में खड़े रहे कई लोग भी रामलीला के आयोजन में आर्थिक और अन्य स्तर पर योगदान देते हैं। यही वजह है कि रामलीला कमेटी के लिए समाज के अलग-अलग धड़ों का सहयोग महत्वपूर्ण है। ऐसे में सोसाइटी की चुनावी राजनीति का सीधा असर रामलीला पर पड़ने की संभावना फिलहाल कम दिखाई देती है। क्योंकि सवाल सिर्फ एक संस्था की राजनीति का नहीं है, सवाल भगवान राम की रामलीला का है। और अशोक विहार में शायद यही वह मंच है, जहां व्यक्तिगत मतभेदों से ऊपर उठकर सभी एक साथ खड़े होते हैं। फिलहाल पहली बैठक का संदेश साफ है—सोसाइटी में चुनाव अलग हो सकता है, राजनीतिक समीकरण अलग हो सकते हैं, लेकिन रामलीला के मंच पर सबको साथ लेकर चलने की कोशिश जारी है। अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में सोसाइटी की नई सियासत और पुराने सामाजिक समीकरण रामलीला कमेटी को किस दिशा में ले जाते हैं।

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